April 21, 2024

नसबंदी कराने 3 साल से भटक रही बैगा महिला

जबलपुर – कमलावती दो बच्चों की मां हैं। एक की उम्र 5 साल, दूसरे की 3 साल। परिवार की माली हालत को देखते हुए वह और उसके पति अब तीसरी संतान नहीं चाहते। वह नसबंदी कराने के लिए तैयार हैं। इसके लिए तीन साल से कोशिश कर रही हैं, लेकिन प्रशासन से अनुमति नहीं मिल रही। वह तीन साल से सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रही हैं। उनका कहना है कि इतनी महंगाई में अपने बच्चों को नहीं पाल सकते हैं। सरकार यदि नसबंदी की अनुमति नहीं दे रही है, तो बच्चों को पालने की जिम्मेदारी भी ले।

दरअसल, कमलावती उस बैगा आदिवासी जाति की हैं, जिसे सरकार ने संरक्षित जातियों की श्रेणी में रखा है। कमलावती का कहना है कि उन्हें सरकार की किसी भी योजना का लाभ नहीं मिल रहा। दूसरे बेटे को जन्म देने के बाद से ही वह नसबंदी कराना चाहती हैं, लेकिन जब भी वो अस्पताल या नसबंदी शिविर में जाती हैं, प्रशासन की परमिशन मांगी जाती है।
कमलावती की कहानी जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम जबलपुर से 30 किलोमीटर दूर बरेला के खैरी गांव पहुंची। गांव में सड़क तो पक्की है, लेकिन मकान कच्चा है। घर के नाम पर छोटा सा कमरा है। उसी से लगा किचन है। शौच के लिए बाहर जाना होता है। घर के अंदर वह दोनों बच्चों को पढ़ा रही थी। वहीं, पति प्रेम कुमार मुर्गी को दाना डाल रहे थे। दैनिक भास्कर के सामने परिवार ने दर्द बयां किया।

जानते हैं कि नसबंदी के लिए 3 साल से भटक रही कमलावती की कहानी….

‘मैं डिंडोरी जिले के डोकरघाट की रहने वाली हूं। 2018 में प्रेम कुमार बैगा (38) से शादी हुई। शादी करने का इरादा भी नहीं था, लेकिन माता-पिता के कहने पर शादी कर ली। दो बच्चे हो गए। बेटी आंगनबाड़ी में पढ़ाई करती है। घर की हालत पहले से ही ठीक नहीं थी।
दो कमरे का कच्चा घर है। बारिश के दिन में घर में पानी आ जाता है। मजदूरी करके घर चलता है। कमाने का दूसरा जरिया नहीं। हम खुद का गुजर-बसर नहीं कर पा रहे। अब आर्थिक हालत और भी खराब हो गई है।
घर में खाने को ठिकाना नहीं। समय के साथ बच्चे बड़े होंगे। पैसे नहीं होंगे, तो कैसे पढ़ाई-लिखाई कराएंगे। कैसे उनका भरण-पोषण होगा। घर में मुर्गी पाली हुई है, जिससे थोड़े बहुत पैसे आते हैं। पेट भरने लायक कमा पाते हैं। कभी-कभी मजदूरी करने भी चले जाते हैं। ऐसे में घर कैसे चलेगा।
सरकार की तरफ से कुछ महीने पहले से ही सिर्फ लाड़ली बहना का लाभ मिल रहा है। महंगाई में इतने में घर कैसे चलेगा? इसके अलावा, शासन की किसी योजना का लाभ नहीं मिलता। जंगल में रहकर हमारी जिंदगी तो कट चुकी है। अब बच्चों के भविष्य के बारे में भी सोचना है।’

बैगा समाज में पैदा हुए… हमारी क्या गलती

कमलावती बताती हैं कि नसबंदी कराने को लेकर पिछले तीन साल से सीएमएचओ और कलेक्टोरेट ऑफिस के चक्कर काट रहे हैं। 12 बार से ज्यादा बार आवेदन दे चुके हैं। गांव से शहर आने-जाने में 2 से 3 हजार रुपए भी खर्च हो चुके हैं। चप्पल घिस गईं, लेकिन नसबंदी नहीं हुई।
पत्नी और बच्चे समेत कई मर्तबा शिकायत लेकर शहर गए। अफसरों के हाथ-पैर जोड़े, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। यही सुनने को मिला- बैगा समाज से हो, आपकी नसबंदी नहीं की जा सकती…। हम बैगा समाज में पैदा हुए, इसमें हमारी गलती क्या है। हमें भी बाकी समाज की तरह चैन से रहने का अधिकार नहीं है….?

‘सरकार की तरफ से मदद मिले, तो तीसरे की सोचें’

कमलावती कहती हैं कि सरकार की तरफ से पैसे या मदद मिलती है, तो हम तीसरे बच्चे के बारे में सोच सकते थे। अगर ऐसा नहीं, तो हम परिवार क्यों आगे बढ़ाएं? इतनी महंगाई में बच्चे नहीं पाल सकते। हमें नसबंदी ही कराना है। इसके लिए चाहे किसी भी हद तक जाना पड़े।
ग्राम पंचायत में काम करते थे। अब वह पैसा भी नहीं मिल रहा। घर में रसोई गैस सिलेंडर भी नहीं। चूल्हे पर खाना बनाना पड़ता है। ऐसे में नसबंदी नहीं कराएं, तो क्या करें?

CM से मिलना चाहते हैं, तभी होगी नसबंदी: कमलावती

कमलावती का कहना है कि मैं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिलना चाहती हूं, लेकिन मुलाकात कैसे होगी, यह पता नहीं। अब वे ही इस पर निर्णय लेंगे। मुख्यमंत्री से मुलाकात हो जाती, तो कुछ और ही बात होती। कमलावती के पति प्रेम कुमार बैगा का कहना है कि यदि नसबंदी नहीं हुई, तब दर-दर की ठोकरें खाना पड़ेगा। हमें समझ नहीं आ रहा है… आखिर क्या करें? अब तो मेरे बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सरकार ले ले या फिर पत्नी को नसबंदी की इजाजत दे दी जाए।

CMHO बोले- कलेक्टर की लिखित परमिशन के बिना संभव नहीं

जबलपुर के संभागीय स्वास्थ्य अधिकारी और प्रभारी सीएमएचओ संजय मिश्रा कहते हैं कि बैगा जाति संरक्षित श्रेणी में है। 2017 में शासन ने निर्देश दिए थे कि बैगा जनजाति की संख्या घट रही है, इसलिए परिवार नियोजन से संबंधित जो ऑपरेशन हैं, न किए जाएं। जिससे उनकी जाति की संख्या समाप्त न हो।

सीएमएचओ बोले- कलेक्टर लिखित में अनुमति दें

जबलपुर के प्रभारी सीएमएचओ संजय मिश्रा का कहना है कि शासन के निर्देश हैं, विशेष परिस्थितियों में कलेक्टर की बिना अनुमति के ऐसा नहीं किया जाए। कलेक्टर लिखित में अनुमति देते हैं तब नसबंदी पर विचार किया जाएगा।

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